I do

I miss you Minji.

Life has changed after you left for heavenly abode. And I feel I am not mentally equipped to play this part- the one that entails me to be mature and understanding..and the one who looks to carry the family forth.

You shouldn’t have left me. Rather, you should be here taking care of us.

Or maybe, I just miss being innocent and reckless. I am no longer the guy who believed in goodness of people.

I don’t know.

I feel lonely, and I know there is no way this…this situation…can be helped, but still I wish you were here.

15 years later

it still makes immense sense.

“But you see, I have, let’s say, sixty years to live. Most of that time will be spent working. I’ve chosen the work I want to do. If I find no joy in it, then I’m only condemning myself to sixty years of torture. And I can find the joy only if I do my work in the best way possible to me. But the best is a matter of standards—and I set my own standards. I inherit nothing. I stand at the end of no tradition. I may, perhaps, stand at the beginning of one.”

Father- 7

मैंने ऐसा कुछ कवियों से सुन रक्‍खा था
जब घटनाएँछाती के ऊपर भार बनें,
जब साँस न लेने दे दिल को आज़ादी से
टूटी आशाओं के खंडहर, टूटे सपने,
तब अपने मन को बेचैनी की छंदों में
संचित कर कोई गए और सुनाए तो
वह मुक्‍त गगन में उड़ने का-सा सुख पाता।
लेकिन मेरा तो भार बना ज्‍यों का त्‍यों है,
ज्‍यों का त्‍यों बंधन है, ज्‍यों की त्‍यों बाधाएँ।

मैंने गीतों को रचकर के भी देख लिया।

‘वे काहिल है जो आसमान के परदे पर
अपने मन की तस्‍वीर बनाया करते हैं,
कर्मठ उनके अंदर जीवन के साँसें भर
उनको नभ से धरती पर लाया करते हैं।’

आकाशी गंगा से गन्‍ना सींचा जाता,
अंबर का तारा दीपक बनकर जलता है,
जिसके उजियारी बैठ हिसाब किया जाता।
उसके जल में अब नहीं ख्‍याल नहीं बैठे आते,

उसके दृग से अब झरती रस की बूँद नहीं,
मैंने सपनों को सच करके भी देख लिया।

यह माना मैंने खुदा नहीं मिल सकता है
लंदन की धन-जोबन-गर्विली गलियों में,
यह माना उसका ख्‍याल नहीं आ सकता है
पेरिस की रसमय रातों की रँरलियों में,

जो शायर को है शानेख़ुदा उसमें तुमको
शैतानी गोरखधंधा दिखलाई देता,
पर शेख, भुलावा दो जो भोलें हैं।
तुमने कुछ ऐसा गोलमाल कर रक्‍खा था,
खुद अपने घर में नहीं खुदा का राज मिला,
मैंने काबे का हज़ करके भी देख लिया।

रिंदों ने मुझसे कहा कि मदिरा पान करो,
ग़म गलत इसी से होगा, मैंने मान लिया,
मैं प्‍याले में डूबा, प्‍याला मुझमें डूबा,
मित्रों ने मेरे मनसुबों को मान दिया।

बन्‍दों ने मुझसे कहा कि यह कमजो़री है,
इसको छोड़ो, अपनी इच्‍छा का बल देखो,
तोलो; मैंने उनका कहना भी कान किया।
मैं वहीं, वहीं पर ग़म है, वहीं पर दुर्बलताएँ हैं,

मैंने मदिरा को पी करके भी देख लिया,

मैंने मदिरा को तज करके भी देख लिया।
मैंने काबे का हज़ करके भी देख लिया।
मैंने सपनों को सच करके भी देख लिया।
मैंने गीतों को रच करके भी देख लिया।

हरिवंशराय बच्चन